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मै नारी हूँ ….

Posted On 13 Jan, 2011 में

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अपने अस्तित्व को ढूँढती हुई
दूर चली जाती हूँ
मै नारी हूँ ….
अस्मिता को बचाते हुए
धरती में समा जाती हूँ
माँ- बहन इन शब्दों में
ये कैसा कटुता
है भर गया
इन शब्दों में अपशब्दों के
बोझ ढोते जाती हूँ
पत्नी-बहू के रिश्तो में
उलझती चली जाती हूँ
अपने अस्तित्व को ढूँढती हुई
दूर चली जाती हूँ
अपने गर्भ से जिस संतान को
मैंने है जन्म दिया
अपनी इच्छाओं की आहुति देकर
जिसकी कामनाओं को पूर्ण किया
आज उस संतान के समक्ष
विवश हुई जाती हूँ
अपने अस्तित्व को ढूँढती हुई
दूर चली जाती हूँ
नारी हूँ पर अबला नही
सृष्टि की जननी हूँ मै
पर इस मन का क्या करूँ
अपने से उत्पन्न सृष्टि के सम्मुख
अस्तित्व छोडती जाती हूँ

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153 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rubi devi के द्वारा
April 23, 2011

mam apke kavita achi lagi jo pure istiri jeevan ko sampun ta se parkat karti hoi .or ye pankti jo kahi rahi hi asimita ko pachate hui dharte me sama jati hui , ye pankti seeta mata ke yad delati ,

    anamika के द्वारा
    April 23, 2011

    धन्यवाद …….सच तो यही है

    Jaxon के द्वारा
    July 12, 2016

    Jan,Actually try modifying the code at line 369 in ameta-includes.php to$order_array = &$order;$params = arrrr_meyge($paaams, $order_array); // php 5.3 wants these to be referencesphp 2.5.4 seems happy with that, and that php manual link seems to imply that that may be what php 5.3 wants.Please let me know if that works!

Tufail A. Siddequi के द्वारा
January 14, 2011

अनामिका जी अभिह्वादन, “अपने गर्भ से जिस संतान को मैंने है जन्म दिया अपनी इच्छाओं की आहुति देकर जिसकी कामनाओं को पूर्ण किया आज उस संतान के समक्ष विवश हुई जाती हूँ अपने अस्तित्व को ढूँढती हुई दूर चली जाती हूँ” बहुत-२ मुबारकबाद.

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 14, 2011

बहुत सुन्दर कविता …… आपकी इस कविता को पढ़कर ‘केदार नाथ पाण्डेय ‘ जी की एक कविता याद आ गयी … आपको इस सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई .. कुशल तूलिका वाले कवि की नारी एक कला है। फूलों से भी अधिक सुकोमल नरम अधिक नवनी से, प्रतिपल पिछल-पिछल उठने वाली अति इन्दु मनी से, नवल शक्ति भरने वाली वह कभी नहीं अबला है। तनया-प्रिया-जननि के अवगुण्ठन में रहने वाली, सत्यं शिवम् सुन्दरम् सी जीवन में बहने वाली, विरह मिलन की धूप-छाँह में पलती शकुन्तला है। है आधार-शिला सुन्दरता की मधु प्रकृति-परी सी, शुभ संसृति का बीज लिये, मनु की उस तरुण-तरी सी, तिमिरावृत्त जीवन के श्यामल पट पर चंद्र्कला है। करुणा की प्रतिमा वियोग की मूर्ति-मधुर-अलबेली निज में ही परिपूर्ण प्रेममय जग आधार अकेली, सारी संसृति टिकी हुई ऐसी सुन्दर अचला है अमृत-सिन्धु ,अमृतमयी जग की कल्याणी वाणी। अब भी चम-चम चमक रही हैं तेरी चरण निशानी, तेरे ही प्रकाश से जगमग दीप जला है। नारी एक कला है॥

    anamika के द्वारा
    January 14, 2011

    अत्यंत सुन्दर रचना …………..रचनाकार को नमन

Alka Gupta के द्वारा
January 14, 2011

अनामिका जी , नारी के विभिन्न रूपों में उसके अस्तित्त्व की पहचान कराने वाली बहुत ही सुन्दर कविता !

विनोद पाराशर के द्वारा
January 13, 2011

दूसरो के व्यक्तित्व को सजाने,संवारने में ही अपने व्यक्तित्व की आहूति देने वाली नारी अबला हो ही नहीं सकती.नारी के मनो-भावों को अभिव्यक्ति देती अति संदर रचना. वाह! अनामिका जी.

R K KHURANA के द्वारा
January 13, 2011

प्रिय अनामिका जी, नारी मन को उकेरती सुंदर रचना ! हाँ अब नारी अबला नहीं रह गयी ! परन्तु फिर भी इस देश में नारी अपने आप को कई बार असहाय सी पाती है ! खुराना

nishamittal के द्वारा
January 13, 2011

अनामिका जी,बहुत सुन्दर कविता नारी के यथार्थ को समझती हुई.पहले भी आपकी पोस्ट पर कमेन्ट किया परन्तु आपकी और से कोई उत्तर नहीं मिलता .

    anamika के द्वारा
    January 13, 2011

    समय की कमी के कारण मैं उत्तर नही दे पाती हूँ इसे आप अन्यथा न ले …..आपने अपनी कीमती प्रतिक्रया से मेरे पोस्ट को नवाज़ा है इसके लिए शुक्रिया

roshni के द्वारा
January 13, 2011

अनामिका जी बहुत सुंदर रचना नारी हूँ पर अबला नही सृष्टि की जननी हूँ मै……. एक से बढकर एक पंक्ति नारी को व्यक्त करती हुई

    anamika के द्वारा
    January 13, 2011

    शुक्रिया

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 13, 2011

नारी ही सृष्टि है इस तथ्य से कोई मुंह नहीं मोड सकता|’शिव’ भी स्त्री रुपी शक्ति के बिना ‘शव’ के समान हैं| फिर भी विडंबनाएं और व्यथाएँ आ खड़ी होती हैं|बहुत ही सुन्दर रचना| **** अपने वाराणसी सम्बंधित लेखों पर आपकी प्रतिक्रिया जानने का सुअवसर प्राप्त नहीं हुआ| प्रतीक्षा रहेगी| साभार,

    anamika के द्वारा
    January 13, 2011

    मैंने आपका लेखन पढ़ा तो है पर प्रतिक्रिया जाहिर नहीं कर पायी इसके लिए क्षमा चाहती हूँ असल में नौकरी के साथ जिम्मेदारिया बढ़ जाती है …….लेकिन आका लेख वाकई बहुत अच्छा था मुझे अपनी प्रतिक्रया से अवगत कराया इसके लिए धन्यवाद

abodhbaalak के द्वारा
January 13, 2011

Anamika ji absolutely right, women is not abla but …. the idol of power.those who consider her week are living in dream… wonderful poem http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    anamika के द्वारा
    January 13, 2011

    नारी अबला नहीं ये सब जानते तो पर मानते बहुत कम लोग है आपने सहमति जताई इसके लिए धन्यवाद


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