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आंसुओं की झड़ी............

Posted On: 18 Dec, 2010 में

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आंसुओं की झड़ी लगी
कहीं समंदर न बन जाए
टूटा दिल बिखर गया पल
दर्द-ए-दिल से जीया न जाए

धुआँ उठा जब सपनो से
राख से आँगन सजा दिया
दीया जो प्यार से जलाया था
गम के झोकों ने बुझा दिया

इस गीले मन को लेकर हम
क्या यूं ही जीये जायेंगे ?
इन कांच की बूंदों को मगर
क्या यूं ही लुटाते जायेंगे ?

ये कैसी दुनिया है जहां
गम आगे पीछे चलता है
खुशियों को इज़ाज़त है ही नहीं
वो बेगाना सा फिरता है

इन आंसुओं की समंदर को
गर कोई किनारा मिल जाए
धुंआ जो उठा ये दिल जो टूटा
ज़ख्मो को राहत मिल जाए

काश ये राहत उसी से मिले
जिसने ज़ख्मो को दाग़ दिया
रूठे हुए किसी अपने ने
शायद रिश्ते का आग़ाज़ किया

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Julz के द्वारा
July 12, 2016

Ja, fine bilder du viser frem i julestas !Ønsker deg og dine en riktig God Jul !Har dessverre falt av lasset pÃ¥ Himmelsk, sÃ¥nn er det nÃ¥r man ikke lenger har kamera som duger til Ã¥ ta bra nok bilder les¸ne…Ãgnrke seg nytt kamera til jul…kanskje

जितेन्द्र माथुर के द्वारा
January 3, 2011

बहुत सुन्दर अनामिका जी । बड़ी भावुक अभिव्यक्ति है यह ।

Aakash Tiwaari के द्वारा
December 20, 2010

अनामिका जी, बहुत ही शुन्दर भावो को बहुत ही कुशलता के साथ व्यक्त किया गया है आपकी कविता में… आकाश तिवारी

    Addriene के द्वारा
    July 12, 2016

    Exactement mon pon#;&i8230tFrustrations contre les femmes = pas charmant Toutes les femmes ne sont aps les même…Visent celles qui ont une tete et les priorités aux bonnes palces aux lieu de viser les poule en bikini qui font des face de canard

December 19, 2010

अनामिका जी, आपकी सुन्दर कविता के लिए- “जख्म जो उसने अपने दिखाए, पत्थर भी जार-जार होकर रिसने लगा, मौसम में इतनी नमी छाई, कि ‘अंगार’ से भी धुआं उठने लगा.

    anamika के द्वारा
    December 20, 2010

    वाह वाह ……….अति सुन्दर …………बढ़िया टिपण्णी के लिए धन्यवाद


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