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पत्तो से टपकती

Posted On: 24 Aug, 2010 Others में

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पत्तो से टपकती वो बारिश की बूंदे
छन से गिरकर वो खिडकी को चूमे
परदे की ओत में छिपता वो बादल
गरजते-बरसते आसमा में झूमे

धरती भी बन मस्त कलंदर
वो नदियाँ भी बहे जो थे कभी अन्दर
हरी-हरी ज़मी पे मेढ़को का शोर
बाँध पायल जंगल में नाच उठा मोर

कतरा दरिया का बन गया समंदर
नई-नवेली धरती दिखे अति सुन्दर
बरसते बादल को कर लो सलाम
बादल तो चंचल है उसे नही है विराम

जाए कही भी बादल संदेसा ले जाए
बरसो इतना की धरा लहलहाए
मरूभूमि पर भी रखे कृपादृष्टि
लगातार बरसो जहां चाहिए अनवरत वृष्टि

मरू हो जाए शीतल ताप भी कम हो जाए
बंजर धरती भी फसल से लहलहाए
बारिश की बूंदों का अहसान रहेगा
किसानो के चेहरे पर मुस्कान बिखरेगा

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R K KHURANA के द्वारा
August 24, 2010

प्रिय अनमिका जी, बारिश की बूंदों का अहसान रहेगा किसानो के चेहरे पर मुस्कान बिखरेगा सुंदर रचना ! खुराना

    Chynna के द्वारा
    July 12, 2016

    Prezado irmão, porque lhe prezo é que lhe peço: fique com os santos doutores, pelos quais falou e ensinou o Espírito Santo na Igreja e os quais nos proíbem de assistir a qualquer culto ou ceb£Ãral§Ãeo fora da Igreja Católica Tradicional, fiel à Doutrina de sempre. Peça perdão a Deus e se confesse. E nunca mais volte a fazer isso. Falei humildemente no amor. Porque amo a Deus, amo aqueles que Ele deseja salvar. “Quem reza com hereges, herege é”, São Roberto Bellarmino.

Ramesh bajpai के द्वारा
August 24, 2010

बाँध पायल जंगल में नाच उठा मोर कतरा दरिया का बन गया समंदर नई-नवेली धरती दिखे अति सुन्दर बहुत खूबसूरत रचना बधाई

    anamika के द्वारा
    August 24, 2010

    धन्यवाद


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