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कागज़ कलम लिए............

Posted On: 10 Jul, 2010 Others में

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कागज़ कलम लिए बैठा हूँ सद्य
आषाड़ में मुझे लिखना है बरखा का पद्य

क्या लिखूं क्या लिखूं समझ ना पाऊँ रे
हताश बैठा हूँ और देखूं बाहर रे

घनघटा सारादिन नभ में बादल दुरंत
गीली-गीली धरती चेहरा सबका चिंतित

नही है काम घर के अन्दर कट गया सारादिन
बच्चों के फुटबोल पर पानी पड़ गया रिमझिम

बाबुओं के चहरे पर नही है वो स्फूर्ति
कंधे पर छतरी हाथ में जूता किंकर्तव्य विमूढ़ मूर्ती

कही पर है घुटने तक पानी कही है घना कर्दम
फिसलने का डर है यहाँ लोग गिरे हरदम

मेढकों का महासभा आह्लाद से गदगद
रातभर गाना चले अतिशय बदखद

श्री सुकुमार राय द्वारा रचित काव्य का काव्यानुवाद

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Char के द्वारा
July 12, 2016

Cher FrançoisNous pensons bien à toi et toute ta famille dans ces moments difficiles.Nous remercions ton père pour toutes ses actions en faveur de la jeunesse et pour sa volonté de transmettre et partager son saicrr.merovBéatiice Dupire lefevere(ieseg promo 1985)

ASHISH RAJVANSHI के द्वारा
July 11, 2010

आदरणीय अनामिका जी , कल्पनाशीलता के साथ अनुवाद किया आपने इस रचना का | मेरी ओर से शुभकामनाएं | धन्यवाद आपका आशीष राजवंशी

    anamika के द्वारा
    July 12, 2010

    धन्यवाद ,तारीफ के लिए शुक्रिया


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